
चल नहीं सकता फिर भी 11 वर्षों से दौड़ा रहा है सिस्टम: हाथों के सहारे 80 प्रतिशत दिव्यांग पुरुषोत्तम जनदर्शन में पहुंच लगाई यह गुहार
प्रशासनिक रिपोर्टर| बलौदा बाजार
जब व्यवस्था अंधी हो जाए और सिस्टम संवेदनाओं से कोसों दूर चला जाए, तो सबसे पहले मार उसी पर पड़ती है, जो सबसे ज्यादा असहाय होते हैं। कुछ ऐसी ही मार झेल रहे हैं पुरुषोत्तम सतनामी, जो जन्म से दिव्यांग हैं और अब सरकारी सिस्टम की बेरुखी का शिकार बन गए हैं।

एक समय था जब नगर पालिका क्षेत्र में रहते हुए उन्हें नियमित रूप से पेंशन मिलती थी, लेकिन जैसे ही वे अपने गांव बिनौरी, विकासखंड पलारी में बस गए और आधार कार्ड बनवा कर दस्तावेजों के साथ नगर पालिका पहुंचे, पेंशन मिलना बंद हो गया। अफसरों ने कह दिया –अब पेंशन गांव से मिलेगा। लेकिन गांव गया तो पंचायत ने कहा – आपका नाम तो 2002 की सर्वे सूची में नहीं है।
नगर पालिका ने पल्ला झाड़ा, पंचायत ने जिम्मेदारी टाली, और समाज कल्याण विभाग ने कहा – पंचायत से आवेदन आएगा तभी होगा कुछ। इस गोल-गोल घुमाने वाले सिस्टम के बीच फंसा एक दिव्यांग, जो चलने के लिए हाथ का सहारा लेता है, पिछले 11 सालों से दर-दर की ठोकरें खा रहा है। अंतिम बार उसे 200 रुपए का पेंशन जून 2014 में मिली थी। तब से वह दर दर की ठोकर खा रहा है। 80 प्रतिशत दिव्यांग पुरुषोत्तम सतनामी आज कलेक्टर जनदर्शन में पहुंचे थे।

सबसे दर्दनाक दृश्य तब सामने आया जब जिला मुख्यालय परिसर में वह व्यक्ति बिना किसी सहारे के चलते हुए देखा गया, जबकि यहां कई अवसरों पर सरकारी व्हीलचेयर से सामान ढोया जाता है। यह दृश्य केवल अव्यवस्था नहीं, बल्कि मानवीयता की शर्मनाक मौत का उदाहरण है।
पुरुषोत्तम ने आखिरकार कलेक्टर दीपक सोनी के जनदर्शन में पहुंचकर अपनी फरियाद रखी – मेरी पेंशन बहाल कर दीजिए। इसके बाद कलेक्टर ने समाज कल्याण विभाग को मामले की जांच करने के निर्देश दिए, साथ ही समस्या का हल करने का आश्वासन दिया।
वहीं जिले में नव पदस्थ समाज कल्याण विभाग की उप संचालक सिनीवाली गोयल ने कहा है कि कलेक्टर जनदर्शन में आवेदन मिला है और कार्रवाई की जा रही है। साथ ही भरोसा दिया गया कि आगे से व्हीलचेयर की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी।
पर सवाल अब भी जिंदा है – क्यों एक दिव्यांग को गिड़गिड़ाना पड़ा? चल नहीं सकता फिर भी 11 वर्षों से दौड़ा रहा है सिस्टम? क्यों 11 साल तक सिस्टम सोता रहा? और कब सरकारी सुविधाएं केवल फाइलों में नहीं, जमीन पर उतरेंगी?
पुरुषोत्तम सतनामी अब अकेले एक व्यक्ति नहीं, वह इस लचर व्यवस्था का आईना हैं, जो “दिव्यांग हितैषी” होने का दावा तो करती है, मगर असल में उनकी आवाज़ सुनने तक को तैयार नहीं।
सरकार और प्रशासन को अब सिर्फ जवाब नहीं देना चाहिए, बल्कि जवाबदेही निभानी चाहिए। वरना दिव्यांगों के हक का गला ऐसे ही घुटता रहेगा और सिस्टम तमाशबीन बना रहेगा।
आपको क्या लगता है, सरकारी सिस्टम को कैसे ठीक किया जा सकता है, आपका सरकारी कार्यालयों का अनुभव कमेंट करें।
Author: Deependra Shukla
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